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ज़करयाह 2

पनरसएक यकि

1 तब ैं अपनमनएक यकि अपनें पनरसिा. 2 ैंउससा, "कहां रहो?"

उसनउततर िा, "ैं शलशहर पनरहूं ि पतचल सकि उसकऔर ़ाितनै."

3 जब झसें करनवरगदरहा, तब एक सरवरगदउससिलनआय4 और उससकहा: "कर , और उस जवकहो, मनों और पशबहयत रण शलिों शहर एगा. 5 और ैं वयं, इसकों ओर आग बन ा,’ हवषणै, और उसकतर ैं उसकमहिबनूंा.’

6 "आओ! आओ! उततर ," हवषणै, "ोंि ैंें आकों िहवसमितर-बितर कर िै," हवषणै.

7 "़ि! आओ, लविों रहतो, बचकर िकलो!" 8 ोंि सरवशकिहवयह कहनै: "उनोंअपनमहिििउन िों िै, िोंें िे—ोंि यदि ें ै, वह उसक(हवी) तलै, 9 ैं ििउनकिअपनउठि उनकउनें ें. तब ओगि सरवशकिहवै.

10 "ी, ़ि, वरों ें और आनिो. ोंि ैं आकर िकरूंा," हवषणै. 11 "उस िबहिां हविऔर बन े. ैं िकरूंऔर ओगि सरवशकिहवै. 12 हवपविें यहिअपनें ेंऔर शलिेंे. 13 सब ों, हवमनांरहो, ोंि उनोंअपनपवििअपनआपकखड़ा िै."

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