कार्यों के द्वारा प्रेम
16 हमने प्रेम को इसी से जाना है, कि उसने हमारे लिए अपना प्राण दे दिया; अतः हमें भी भाइयों के लिए अपना प्राण देना चाहिए। 17 परंतु जिसके पास सांसारिक धन-संपत्ति है और अपने भाई को आवश्यकता में देखकर उसके प्रति अपना हृदय कठोर कर लेता है, तो परमेश्वर का प्रेम उसमें कैसे बना रहेगा? 18 बच्चो, हम अपने शब्द या जीभ से ही नहीं, बल्कि कार्य और सच्चाई के द्वारा भी प्रेम रखें।