1 "स्वर्ग का राज्य उन दस कुँवारियों के समान होगा जो अपनी-अपनी मशालें लेकर दूल्हे से मिलने के लिए निकलीं। 2 उनमें पाँच मूर्ख और पाँच बुद्धिमान थीं। 3 मूर्खों ने अपनी मशालों को तो लिया पर अपने साथ तेल नहीं लिया; 4 परंतु बुद्धिमानों ने अपनी मशालों के साथ कुप्पियों में तेल भी लिया। 5 जब दूल्हे के आने में देर हो रही थी, तो वे सब ऊँघने लगीं और सो गईं। 6 आधी रात को पुकार हुई, ‘देखो दूल्हा आ रहा है, उससे मिलने चलो।’ 7 तब उन सब कुँवारियों ने उठकर अपनी-अपनी मशालें तैयार कीं। 8 तब मूर्खों ने बुद्धिमानों से कहा, ‘अपने तेल में से कुछ हमें भी दे दो, क्योंकि हमारी मशालें बुझ रही हैं।’ 9 इस पर बुद्धिमानों ने कहा, ‘नहीं, यह हमारे और तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं होगा; अच्छा होगा कि तुम बेचनेवालों के पास जाकर अपने लिए खरीद लो।’ 10 जब वे खरीदने जा रही थीं कि दूल्हा आ पहुँचा, और जो कुँवारियाँ तैयार थीं, वे उसके साथ विवाह के घर में चली गईं और द्वार बंद कर दिया गया। 11 इसके बाद वे अन्य कुँवारियाँ भी आईं और कहने लगीं, ‘हे स्वामी, हे स्वामी! हमारे लिए द्वार खोल दे।’ 12 इस पर उसने कहा, ‘मैं तुमसे सच कहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं जानता।’ 13 इसलिए जागते रहो, क्योंकि तुम न तो उस दिन को और न ही उस घड़ी को जानते हो।
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