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अय्यूब 19

अय्यूब का छठवां जवाब: बिलदद को जवाब

1 तब अय्यूब ने जवाब दिया

2 तुम कब तक मेरी जान खाते रहोगे,

और बातों से मुझे चूर — चूर करोगे?

3 अब दस बार तुम ने मुझे मलामत ही की;

तुम्हें शर्म नहीं आती की तुम मेरे साथ सख़्ती से पेश आते हो।

4 और माना कि मुझ से ख़ता हुई;

मेरी ख़ता मेरी ही है।

5 अगर तुम मेरे सामने में अपनी बड़ाई करते हो,

और मेरे नंग को मेरे ख़िलाफ़ पेश करते हो;

6 तो जान लो कि ख़ुदा ने मुझे पस्त किया,

और अपने जाल से मुझे घेर लिया है।

7 देखो, मैं जु़ल्म जु़ल्म पुकारता हूँ, लेकिन मेरी सुनी नहीं जाती।

मैं मदद के लिए दुहाई देता हूँ, लेकिन कोई इन्साफ़ नहीं होता।

8 उसने मेरा रास्ता ऐसा शख़्त कर दिया है, कि मैं गुज़र नहीं सकता।

उसने मेरी राहों पर तारीकी को बिठा दिया है।

9 उसने मेरी हशमत मुझ से छीन ली,

और मेरे सिर पर से ताज उतार लिया।

10 उसने मुझे हर तरफ़ से तोड़कर नीचे गिरा दिया, बस मैं तो हो लिया,

और मेरी उम्मीद को उसने पेड़ की तरह उखाड़ डाला है।

11 उसने अपने ग़ज़ब को भी मेरे ख़िलाफ़ भड़काया है,

और वह मुझे अपने मुख़ालिफ़ों में शुमार करता है।

12 उसकी फ़ौजें इकट्ठी होकर आती और मेरे ख़िलाफ़ अपनी राह तैयार करती

और मेरे ख़ेमे के चारों तरफ़ ख़ेमा ज़न होती हैं।

13 उसने मेरे भाइयों को मुझ से दूर कर दिया है,

और मेरे जान पहचान मुझ से बेगाना हो गए हैं।

14 मेरे रिश्तेदार काम न आए,

और मेरे दिली दोस्त मुझे भूल गए हैं।

15 मैं अपने घर के रहनेवालों और अपनी लौंडियों की नज़र में अजनबी हूँ।

मैं उनकी निगाह में परदेसी हो गया हूँ।

16 मैं अपने नौकर को बुलाता हूँ और वह मुझे जवाब नहीं देता,

अगरचे मैं अपने मुँह से उसकी मिन्नत करता हूँ।

17 मेरी साँस मेरी बीवी के लिए मकरूह है,

और मेरी मित्रत मेरी माँ की औलाद "के लिए।

18 छोटे बच्चे भी मुझे हक़ीर जानते हैं;

जब मैं खड़ा होता हूँ तो वह मुझ पर आवाज़ कसते हैं।

19 मेरे सब हमराज़ दोस्त मुझ से नफ़रत करते हैं

और जिनसे मैं मुहब्बत करता था वह मेरे ख़िलाफ़ हो गए हैं।

20 मेरी खाल और मेरा गोश्त मेरी हड्डियों से चिमट गए हैं,

और मैं बाल बाल बच निकला हूँ।

21 ऐ मेरे दोस्तो! मुझ पर तरस खाओ, तरस खाओ,

क्यूँकि ख़ुदा का हाथ मुझ पर भारी है!

22 तुम क्यूँ ख़ुदा की तरह मुझे सताते हो?

और मेरे गोश्त पर कना’अत नहीं करते?

23 काश कि मेरी बातें अब लिख ली जातीं,

काश कि वह किसी किताब में लिखी होतीं;

24 काश कि वह लोहे के क़लम और सीसे से,

हमेशा के लिए चट्टान पर खोद दी जातीं।

25 लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरा छुड़ाने वाला ज़िन्दा है।

और आ़खिर कार ज़मीन पर खड़ा होगा।

26 और अपनी खाल के इस तरह बर्बाद हो जाने के बाद भी,

मैं अपने इस जिस्म में से ख़ुदा को देखूँगा।

27 जिसे मैं खुद देखूँगा, और मेरी ही आँखें देखेंगी न कि ग़ैर की;

मेरे गुर्दे मेरे अंदर ही फ़ना हो गए हैं।

28 अगर तुम कहो हम उसे कैसा — कैसा सताएँगे;

हालाँकि असली बात मुझ में पाई गई है।

29 तो तुम तलवार से डरो,

क्यूँकि क़हर तलवार की सज़ाओं को लाता है

ताकि तुम जान लो कि इन्साफ़ होगा।"

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