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अय्यूब 9

अय्यूब का तिसरा बयान: बिलदद को जवाब

1 फ़िर अय्यूब ने जवाब दिया

2 दर हक़ीक़त में मैं जानता हूँ कि बात यूँ ही है,

लेकिन इंसान ख़ुदा के सामने कैसे रास्तबाज़ ठहरे।

3 अगर वह उससे बहस करने को राज़ी भी हो,

यह तो हज़ार बातों में से उसे एक का भी जवाब न दे सकेगा।

4 वह दिल का 'अक़्लमन्द और ताक़त में ज़ोरआवर है,

किसी ने हिम्मत करके उसका सामना किया है और बढ़ा हो।

5 वह पहाड़ों को हटा देता है

और उन्हें पता भी नहीं लगता वह अपने क़हर में उलट देता है।

6 वह ज़मीन को उसकी जगह से हिला देता है,

और उसके सुतून काँपने लगते हैं।

7 वह सूरज को हुक्म करता है और वह तुलू' नहीं होता है,

और सितारों पर मुहर लगा देता है

8 वह आसमानों को अकेला तान देता है,

और समन्दर की लहरों पर चलता है

9 उसने बनात — उन — नाश और जब्बार और

सुरैया और जुनूब के बुजों' को बनाया।

10 वह बड़े बड़े काम जो बयान नहीं हो सकते,

और बेशुमार अजीब काम करता है।

11 देखो, वह मेरे पास से गुज़रता है लेकिन मुझे दिखाई नहीं देता;

वह आगे भी बढ़ जाता है लेकिन मैं उसे नहीं देखता।

12 देखो, वह शिकार पकड़ता है; कौन उसे रोक सकता है?

कौन उससे कहेगा कि तू क्या करता है?

13 "ख़ुदा अपने ग़ुस्से को नहीं हटाएगा।

रहब' के मददगार उसके नीचे झुकजाते हैं।

14 फिर मेरी क्या हक़ीक़त है कि मैं उसे जवाब दूँ

और उससे बहस करने को अपने लफ़्ज़ छाँट छाँट कर निकालूँ?

15 उसे तो मैं अगर सादिक़ भी होता तो जवाब न देता।

मैं अपने मुख़ालिफ़ की मिन्नत करता।

16 अगर वह मेरे पुकारने पर मुझे जवाब भी देता,

तोभी मैं यक़ीन न करता कि उसने मेरी आवाज़ सुनी।

17 वह तूफ़ान से मुझे तोड़ता है,

और बे वजह मेरे ज़ख़्मों को ज़्यादा करता है।

18 वह मुझे दम नहीं लेने देता,

बल्कि मुझे तल्ख़ी से भरपूर करता है।

19 अगर ज़ोरआवर की ताक़त का ज़िक्र हो, तो देखो वह है।

और अगर इन्साफ़ का, तो मेरे लिए वक़्त कौन ठहराएगा?

20 अगर मैं सच्चा भी हूँ, तोभी मेरा ही मुँह मुझे मुल्ज़िम ठहराएगा।

और अगर मैं कामिल भी हूँ तोभी यह मुझे आलसी साबित करेगा।

21 मैं कामिल तो हूँ, लेकिन अपने को कुछ नहीं समझता;

मैं अपनी ज़िन्दगी को बेकार जानता हूँ।

22 यह सब एक ही बात है, इसलिए मैं कहता हूँ

कि वह कामिल और शरीर दोनों को हलाक कर देता है।

23 अगर वबा अचानक हलाक करने लगे,

तो वह बेगुनाह की आज़माइश का मज़ाक़ उड़ाता है।

24 ज़मीन शरीरों को हवाले कर दी गई है।

वह उसके हाकिमों के मुँह ढाँक देता है।

अगर वही नहीं तो और कौन है?

25 मेरे दिन हरकारों से भी तेज़रू हैं।

वह उड़े चले जाते हैं और ख़ुशी नहीं देखने पाते।

26 वह तेज़ जहाज़ों की तरह निकल गए,

और उस उक़ाब की तरह जो शिकार पर झपटता हो।

27 अगर मैं कहूँ, कि 'मैं अपना ग़म भुला दूँगा,

और उदासी छोड़कर दिलशाद हूँगा,

28 तो मैं अपने दुखों से डरता हूँ,

मैं जानता हूँ कि तू मुझे बेगुनाह न ठहराएगा।

29 मैं तो मुल्ज़िम ठहरूँगा;

फिर मैं 'तो मैं ज़हमत क्यूँ उठाऊँ?

30 अगर मैं अपने को बर्फ़ के पानी से धोऊँ,

और अपने हाथ कितने ही साफ़ करूँ।

31 तोभी तू मुझे खाई में ग़ोता देगा,

और मेरे ही कपड़े मुझ से घिन खाएँगे।

32 क्यूँकि वह मेरी तरह आदमी नहीं कि मैं उसे जवाब दूँ,

और हम 'अदालत में एक साथ हाज़िर हों।

33 हमारे बीच कोई बिचवानी नहीं,

जो हम दोनों पर अपना हाथ रख्खे।

34 वह अपनी लाठी मुझ से हटा ले,

और उसकी डरावनी बात मुझे परेशान न करे।

35 तब मैं कुछ कहूँगा और उससे डरने का नहीं,

क्यूँकि अपने आप में तो मैं ऐसा नहीं हूँ।

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