इलीमलिक का अपने खानदान के साथ मौआब में जाकर रहना
1 उन ही दिनों में जब क़ाज़ी इन्साफ़ किया करते थे, ऐसा हुआ कि उस सरज़मीन में काल पड़ा, यहूदाह बैतलहम का एक आदमी अपनी बीवी और दो बेटों को लेकर चला कि मोआब के मुल्क में जाकर बसे।
16 रुत ने कहा, "तू मिन्नत न कर कि मैं तुझे छोडूं और तेरे पीछे से लौट जाऊँ; क्यूँकि जहाँ तू जाएगीं मै जाऊँगी और जहाँ तू रहेगी मैं रहूँगी, तेरे लोग मेरे लोग और तेरा ख़ुदा मेरा ख़ुदा होगा। 17 जहाँ तू मरेगी मैं मरूँगीं और वहीं दफ़्न भी हूँगी; ख़ुदावन्द मुझ से ऐसा ही बल्कि इस से भी ज़्यादा करे, अगर मौत के अलावा कोई और चीज़ मुझ को तुझ से जुदा न कर दे।" 20 उसने उनसे कहा, "मुझ को न’ओमी नहीं बल्कि मारह कहो, कि1:20 क़ादिर — ए — मुतलक़ खुदा क़ादिर — ए — मुतलक मेरे साथ बहुत तल्ख़ी से पेश आया है। 21 मैं भरी पूरी गई, ख़ुदावन्द मुझ को ख़ाली लौटा लाया। इसलिए तुम क्यूँ मुझे न’ओमी कहती हो, हालाँकि ख़ुदावन्द मेरे ख़िलाफ़ दा’वेदार हुआ और क़ादिर — ए — मुतलक ने मुझे दुख दिया?"