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मीकाह 4

हवपरवत

1 ि िों

ें वह परवत और पह

िपर हवभवन ै;

उसऔर िा,

और सब ि बहतनदसमउस ओर आएे.

2 और ि कहेंे,

"आओ, हम हवपरवत,

परमवर भवन चलें.

ि वह हमें अपनियम िं,

और हम उनकों पर चलें."

ोंि ़ियवसिकली,

और शलहववचन आएगा.

3 परमवर जनतकरें

और ों परिां करेंे.

तब अपनतलवों ट-पटकर हल

तथअपनों िबनेंे.

एक सरितलवनहीं उठा,

तथउनें िकभलडिनहीं िएगा.

4 हर एक जन अपनलत

और अपना,

और उनें नहीं डरएगा,

ोंि सरवशकिहवकहै.

5 सब िां अपने-अपन

वतकर चलें चलें,

पर हम सदा-सरवदहव

अपनपरमवर कर चलेंे.

हवजन

6 "उस ि," यह हवषणै,

"ैं गड़ों इकटकरूंा;

ैं ों

और उन ों इकटकरूंिें ैंुःिै.

7 ैं गड़ों अपनबच,

और भगएक मजबि बना.

तब उस समय कर सदा-सरवदतक

हव़िपरवत उन पर सन करतरहेंे.

8 जहां तक सवै, ुंकसमच,

़िरकगढ़,

ें पहलिएगा;

शलजपद िएगा."

9 उचवर ें ों िरहो,

नहीं ै?

सन करनगयै,

ि जचसमदरछटपटरहो?

10 ़िी, जचतरह

दरछटपट,

ोंि अब ें शहर कर

ें लनै.

ओगी;

और बचओगी.

वहां हवें

शत़ाे.

11 पर अब िें

बहइकट्‍ैं.

कहतैं, "उसअशो,

़िगति हमआनिषय ो!"

12 पर हविों

नहीं नतैं;

उसकउस जननहीं समझते,

ि उसनउनें िों समखलिें इकटिै.

13 "़िी, उठ और ांवनकर,

ोंि ैं ें ींूंा;

ैं ें तल ूंा,

और बहिों कड़े-कड़े कर ी."

उनकगई ़ें हवो,

और उनकपति रभअरिकरी.

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