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सूक्ति संग्रह 19

1 वह िधन यकि, िसकलचलन खरै,

उस यकि उततम ै, िऔर ी.

2 न-रहिइचिररथक

तथवह, ििउतवलकरतै, लक्‍नहीं कर ा!

3 जब ियकि खतपरिमसवरउसकजनिफल ैं,

तब उसकदय ें हवरति भडउठतै.

4 धन-सपति अननए िों आकरिकरतै,

िंिधन यकि िउसकर चलैं.

5 ििै,

तथिवह ा, ै.

6 उदयकि समरथन अनयकि हतैं,

और उस यकि िसभैं, उपहें उदै.

7 िधन यकि अपनिों िै.

उसकिउससितनैं!

वह उनें मनरह ै,

िंइसकउन पर रभनहीं पडा.

8 ि ्‍करनवयकरनै;

तथरकिरखनसमि ै.

9 िितथै,

वह नषएगा.

10 रहननहीं ा,

िरकसकों पर सन करना.

11 सदि मनपर िरण रखनबनै;

और जब वह अपरै, उसकरतिै.

12 िंगरजनसमै,

िंउसकपर पड़ी ओस सम.

13 ििरक ै,

और झगड़ापति

टपक रहजल सम.

14 घर और पति वजों धन ै,

िंिमतपतहवओर ्‍ै.

15 आलसपरिगहन ीं,

यकि रह ै.

16 वह, आदों नतै, अपनवन रककरतै,

िंअपनलचलन िषय ें असवधरहतै, अपनै.

17 वह, िधनों रति उदमन ै, हवऋण ै;

हवउसउततम रतिफल रदकरेंे.

18 यथभव अपनपर अनसन रखउसें आशििै;

िंइस तक , ि इसमें उसक.

19 अति यकि इसकगनै;

यदि उसबचओगसमसरकिहररहे.

20 परमरपर िकरतरहऔर िकरो,

ि उततरतर ि.

21 मनमन ें अनक-अनजनउतपन्‍रहतैं,

िंततहवउदै.

22 मनें खरअपै;

तथलनअपिधन अधिउततम ै.

23 हवरति रदवन ै;

तथििें यह भय ै, उसकिरहतै, अनिउसकपरनहीं करता.

24 एक आलसऐसै, अपनजन ें ै;

िंआलसें जन तक नहीं ा.

25 ठटकरनपर रहकरि सरल-सरण यकि िबन े;

िकशयकि ांकरि उसकबढसके.

26 यकि अपनिरति िंसक तथअपनघर हर िै,

ऐसै, परिपर लजऔर िंआतै.

27 , यदि िननो,

वचनों चलओगे.

28 िउपहकरतै,

और अपरसमरथन करतै.

29 ठटकरनों िििै,

और ि़े ैं.

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