6 "का येह ओ किसम के उपास नो हय, जेकर ले में खुस होथंव:
कि अनियाय के बंधना ला टोर दिये जावय
अऊ जुड़ा के बंधना ला खोलके
अतियाचार सहइयामन ला सुतंतर कर दिये जावय
अऊ हर एक जुड़ा ला टोर दिये जावय?
7 का येह ओ किसम के उपास नो हय, कि भूखन मन के संग खाना बांटे जावय
अऊ गरीब घुमंतू ला आसरय दिये जावय—
जब तुमन नंगरामन ला देखथव, त ओमन ला ओनहा पहिरावव,
अऊ अपन खुद के रिस्तेदारमन ले मुहूं झन मोड़व?
8 तब तुम्हर अंजोर ह बिहान पहाय सहीं चमकही,
अऊ तुम्हर चंगई ह जल्दी दिखही;
तब तुम्हर धरमीपन58:8 या तुम्हर धरमी जन ह तुम्हर आघू-आघू जाही,
अऊ यहोवा के तेज ह तुम्हर पाछू तुम्हर रकछा करही।
9 तब तुमन पुकारहू, अऊ यहोवा जबाब दीही;
तुमन मदद बर बिनती करहू, अऊ ओह कहिही: में इहां हंव।
"यदि तें अंधेर करई के जुड़ा के संग
अंगरी उठई अऊ दुस्ट बात करई के आदत ला छोंड़ देबे,