27 ऐ याक़ूब की क़ौम, तू क्यों कहती है कि मेरी राह रब की नज़र से छुपी रहती है? ऐ इसराईल, तू क्यों शिकायत करता है कि मेरा मामला मेरे ख़ुदा के इल्म में नहीं आता?
28 क्या तुझे मालूम नहीं, क्या तूने नहीं सुना कि रब लाज़वाल ख़ुदा और दुनिया की इंतहा तक का ख़ालिक़ है? वह कभी नहीं थकता, कभी निढाल नहीं होता। कोई भी उस की समझ की गहराइयों तक नहीं पहुँच सकता। 29 वह थकेमाँदों को ताज़गी और बेबसों को तक़वियत देता है। 30 गो नौजवान थककर निढाल हो जाएँ और जवान आदमी ठोकर खाकर गिर जाएँ, 31 लेकिन रब से उम्मीद रखनेवाले नई ताक़त पाएँगे और उक़ाब के-से पर फैलाकर बुलंदियों तक उड़ेंगे। न वह दौड़ते हुए थकेंगे, न चलते हुए निढाल हो जाएंगे।