10 जो धन से प्रेम रखता है वह धन से संतुष्ट नहीं होगा, और धन-संपत्ति से प्रेम रखनेवाला भी उसके लाभ से संतुष्ट नहीं होगा। यह भी व्यर्थ है। 11 जब संपत्ति बढ़ती है तो उसके खानेवाले भी बढ़ते हैं। अतः उसके स्वामी को इसके अतिरिक्त क्या लाभ होगा कि वह संपत्ति को अपनी आँखों से देखकर तृप्त हो? 12 श्रमिक चाहे थोड़ा खाए या बहुत, उसे मीठी नींद आती है; परंतु धनी को उसके धन की बहुतायत सोने नहीं देती।
13 मैंने संसार में एक दुखदायक बुराई देखी है : धन का स्वामी उसका संचय अपनी ही हानि के लिए करता है। 14 वह धन किसी विपत्ति में नष्ट हो जाता है, और उसके घर पुत्र उत्पन्न होता है परंतु उसके हाथ में कुछ नहीं होता। 15 जैसे वह अपनी माँ के गर्भ से नंगा आया था, वैसे ही नंगा लौट जाएगा। वह अपने परिश्रम के फल में से कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकेगा।