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ज़बूर 32

आफ़ी बरकत (सर)

1 ऊद िकमत

रक वह िसकजरयम आफिगए, िसकाँगए ैं।

2 रक वह िसकरब िें नहीं एगऔर िसकें नहीं ै।

3 जब ैं रहिन-भर आहें भरनहडिाँ गलनलगीं।

4 ोंि िन-रैं तलिसतरहा, समे-गरमलसततपिें रही। (ि)

5 तब ैंमनअपनतसलिा, ैं अपनआया। ैं ा, "ैं रब मनअपनजरयम इककरूँा।" तब आफकर िा। (ि)

6 इसलितमईमनदउस वक़्झसकरें जब िसकतै। यक़ीनन जब बड़ा आए उन तक नहीं पहुँा।

7 पनजगह ै, परमहफ़ूरखता, नजनगों ै। (ि)

8 "ैं ूँा, वह ििपर ै। ैं मशवरकर ख-भकरूँा।

9 समझ ़े चर िंो, िपर ़ािलगऔर दहरत ै, वरनवह नहीं आएे।"

10 तअदिपरिाँ ैं, िरब पर भररखउसवह अपनशफरखतै।

11 तब़ो, रब ़ुें जशन मन! तमिनतदो, दमलग!

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