मुआफ़ी की बरकत (तौबा का दूसरा ज़बूर)
1 दाऊद का ज़बूर। हिकमत का गीत।
मुबारक है वह जिसके जरायम मुआफ़ किए गए, जिसके गुनाह ढाँपे गए हैं।
2 मुबारक है वह जिसका गुनाह रब हिसाब में नहीं लाएगा और जिसकी रूह में फ़रेब नहीं है।
3 जब मैं चुप रहा तो दिन-भर आहें भरने से मेरी हड्डियाँ गलने लगीं।
4 क्योंकि दिन-रात मैं तेरे हाथ के बोझ तले पिसता रहा, मेरी ताक़त गोया मौसमे-गरमा की झुलसती तपिश में जाती रही। (सिलाह)
5 तब मैंने तेरे सामने अपना गुनाह तसलीम किया, मैं अपना गुनाह छुपाने से बाज़ आया। मैं बोला, "मैं रब के सामने अपने जरायम का इक़रार करूँगा।" तब तूने मेरे गुनाह को मुआफ़ कर दिया। (सिलाह)
6 इसलिए तमाम ईमानदार उस वक़्त तुझसे दुआ करें जब तू मिल सकता है। यक़ीनन जब बड़ा सैलाब आए तो उन तक नहीं पहुँचेगा।
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