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यशायाह 56

अनयजिों िउद

1 यहयह कहतै, "लन करो, और धरकरो; ोंि ैं उदकरूँा, और धररगट ा। 2 धनवह मनऐसकरता, और वह आदमइस पर िरहतै, िमदिपविनतऔर अपविकरनबचरहतै, और अपनसब ाँि करनकतै।"

3 परदयहिगए ैं, कहें, "यहहमें अपनरजिचय अलग करा;" और कहें, "हम ैं56:3 हम ैं: ऊसर, अनपयऔर फलहदशदरै। यहाँ कहनअरि अब आगिएवगरिअययतअधनहीं ोंिसकअधअब तक रहे।" 4 "ोंि िमदिनतऔर िैं रसनरहतूँ उसअपनऔर लन करतैं," उनकिषय यहयह कहतै, 5 "ैं अपनभवन और अपनशहरपनतर उनकऐसूँर-पिों कहीं उततम ा; ैं उनकसदबनरखूँऔर वह कभिएगा।

6 "परदयहइस इचिैं ि उसकटहल करें और यहि रखें और उसकँ, ितनिमदिअपविकरनबचरहतऔर लतैं, 7 उनकैं अपनपविपरवत पर आकर अपनथनभवन ें आननिकरूँा; उनकमबलि और लबलि पर रहण िे; ोंि भवन सब ों ों िथनघर कहलएगा। (मला. 1:11, मर. 11:17, 1 पत. 2:5) 8 रभयहा, िइसएलिों इकटकरनै, उसकयह ि इकटिगए ैं उनकैं औरों इकटकरकिूँा।" (. 10:16)

इसएल िअग

9 सब जनं, वन सब पशं, िआओ10 उसकपहरैं, सब सब अजैं, सब सब ूँैं ौंनहीं सकते; वपखनऔर रहकर रहनहतैं। 11 मरभैं कभनहीं े। चरवैं िनमें समझ नहीं56:11 चरवैं िनमें समझ नहीं: मनों आवशयकतरति उदैं और समझ नहीं ि उनसअपगई ै। ; उन सभअपने-अपनिअपना-अपनिै। 12 कहतैं, "आओ, हम खमधआएँ, आओ मदिकर छक ँ; कल िआज समअतयनवना।" (12:19-20, 1 ि. 15:32)

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