1 फेर शूही नगरवासी बिल्दद नै कह्या,
2 "तू कद तक इसी-इसी बात करदा रहवैगा?
अर तेरे मुँह की बात कद तक घणी तेज हवा की तरियां रहवैगी?
3 के परमेसवर अन्याय करै सै?
अर के सर्वशक्तिमान धार्मिकता का उलटा करै सै?
4 जै तेरे बाळकां नै उसके खिलाफ पाप करया सै,
तो उसनै उन ताहीं उनके अपराध का फळ भुगताया सै।
5 फेर भी जै तू आप परमेसवर नै यत्न तै टोहन्दा,
अर सर्वशक्तिमान तै गिड़गिड़ाकै बिनती करदा,
6 अर जै तू निर्मल अर धर्मी रहन्दा,
तो जरुर वो तेरै खात्तर जागदा;
अर तेरी धार्मिकता का बसेरा फेर न्यू का न्यू कर देन्दा।
7 चाहे तेरा भाग पैहला छोट्टा ए रहया हो पर
आखरी म्ह तेरी भोत घणी बढ़ती होन्दी।"
8 "पिच्छली पीढ़ी के माणसां तै तो पूछ,
अर जो कुछ उनके पुरखां नै जाँच पड़ताळ करी सै उसपै ध्यान दे।
9 क्यूँके हम तो कल के सां, अर कुछ न्ही जाणदे;
अर धरती पै म्हारे दिन छाया की तरियां बीतदे जावैं सै।
10 के वो माणस तेरे तै शिक्षा की बात न्ही कहवैंगे?
के वो अपणे मन तै बात न्ही लिकाड़ैगें?"
11 "के कछार की घास पाणी बिना बढ़ सकै सै?
के सरकण्डा पाणी बिना बढै़ सै?
12 चाहे वो हरी हो, अर काट्टी भी ना गई हो,
फेर भी वो और सारी तरियां की घास तै
पैहलाए सूख ज्या सै।
13 परमेसवर के सारे बिसराण आळयां की गति इसीए होवै सै
अर भगतिहीन की आस टूट ज्या सै।
14 उसकी आस का मूळ कट ज्या सै;
अर जिसका वो भरोस्सा करै सै, वो मकड़ी का जाळा ठहरया सै।
15 चाहे वो अपणे घर पै टेक लगावै पर वो ना ठहरैगा;
वो उस ताहीं मजबुत्ती तै थामैगा पर वो टिक्या ना रहवैगा।
16 वो धूप पाकै हरा भरया हो ज्या सै,
अर उसकी डाळियाँ बगीचे म्ह च्यांरु ओड़ फैल्लै सै।
17 उसकी जड़ कंकड़ा के ढेर म्ह लिपटी रहवै सै,
अर वो पत्थर की जगहां नै देख लेवै सै।
18 पर जिब वो अपणी जगहां पै तै नाश करया जावै,
फेर वो जगहां उसतै न्यू कहकै
मुँह मोड़ लेवै सै, ‘अर मन्नै उस ताहीं कदे देख्या ए न्ही।’
19 देख, उसकी आनन्द भरी चाल याए सै;
फेर उस्से माट्टी म्ह तै दुसरे उगैंगे।"
20 "देख, परमेसवर ना तो खरे माणस नै निकम्मा जाणकै छोड़ दे सै,
अर ना बुराई करण आळयां नै सम्भाळै सै।
21 वो तो तन्नै हँसमुख करैगा;
अर तेरे तै जयजयकार करावैगा।
22 तेरे बैरी शर्म के कपड़े पैहरैगें,
अर दुष्टां का डेरा किते न्ही रहण पावैगा।"