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लैव्यव्यवस्था 25:35-37

कंगालां नै उधार देणा

35 "फेर जै तेरा कोए भाई-बन्धु कंगाल हो ज्या, अर उसकी हालत तेरे स्याम्ही उसपै तरस कै लायक हो, तो तू उसनै संभाळिए; वो परदेशी या मुसाफिर की ढाळ तेरै गैल रहवै। 36 उसतै ब्याज या बढ़दी ना लियो; अपणे परमेसवर का भय मानियो; जिसतै तेरा भाई-बन्धु तेरै गैल जिन्दगी गुजार सकै। 37 उस ताहीं ब्याज पै रपिये ना दियो, अर ना उसनै खाण की चीज फायदा के लालच तै दिए।

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