इन्सान को परमेश्वर कि आज्ञा नि माननु
1 परमेश्वर ने जेत्ता जंगली जनवर बनाया था, उन सब मे साप चलाक थो, अरु ओने बइ से बोल्यो, "का सच हइ, कि परमेश्वर ने बोल्यो, तुम या बगीचा का कोय भी झाड को फल नी खानु?" 2 बइ ने साप से बोल्यो, या बगीचा का झाडहोन को फल हम खै सकस हइ; 3 पर जो झाड बगीचा का बीच मे हइ, ओका फल का बारे मे परमेश्वर ने बोल्यो हइ कि नी ते तुम ओ खे खानु अरु नी ओ खे छिनु, नि ते मरी जाह्ये. 4 तब साप ने बइ से बोल्यो, "तुम निश्चय नी मरन का. 5 परमेश्वर खुद जानस हइ कि जो दिन तुम ओको फल खाये उय दिन तुमारा आखहोन खुली जाये, अरु तुम भला बुरा को ज्ञान पैइ खे परमेश्वर का जसा हुय जाये."3:5 एज खेल 28:2 6 आखरी जब बइ ने देख्यो कि उ झाड को फल खान मे अच्छो, अरु देखना मे मनोहर, अरु बुद्धी देन का लिये चाहनो जसो भी हइ, तब ओने ओमे से तोडी खे खायो; अरु अपना अदमी खे भी दियो, जो ओका साथ थो अरु ओने भी खायो.