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यशायाह 23

िषय ें नबवत

1 िें भवियवी:

तरशजलयों िकरो!

ोंि नगर नषकर िगयै,

वहां घर बचऔर दरग.

इसकचन

ििमयों गई.

2 ििो,

ि,

ें ों समिै.

3 उनोंअनगरों ी,

अन्‍;

और नदिों उपज उनकआमदनी,

और यह अनों िजगह ी.

4 लजि,

ोंि समयह षणै:

"रसव ़ा और ैंििजनिा;

ैंवकों और कनलन षण िा."

5 जब यह समिपहुंो,

िषय ें िसमुःे.

6 उस तरशनगर चल;

और ििो, .

7 यहभरनगर ै,

समय चलरहै,

िसमें कनि

तक चले?

8 वह नगर ों ा,

िसकसक,

और िसकयवसरतिियकि े,

िसनिऐसजनबन?

9 सरवशकिहवे,

समसुंदरतघमर-चकर

और रतििों कर ियह जनबनै.

10 तरशनगर ी,

नदसमअपनकरकउस चल,

अब िनहीं बचा.

11 हवसमपर अपनांउठ

उनोंों ििै.

हवकनिषय ें

उसकगढकर आदिै.

12 हवकहै, "ुःुंी,

अब और आनिी!

"उठो, ििमयों उस चल;

िंें वहां ांि नहीं िी."

13 कसदिों पर ो,

ैं वसरहगए ैं!

अशइनें

गलपशििा;

उनोंउनें रकर मट खड़े ि,

उनोंउनकों ि

उनोंइसडहर बनिा.

14 तरशजहों, ;

ोंि गढनषगए ैं!

15 उस िनगर एक िों समसततर वरों िबढ़ा िएगा. सततर वरों तनपर, लगा:

16 "ा,

कर नगर ें ;

बजऔर ा,

ि करें."

17 सततर वरों तनपर हवपर ेंे. िकरनलगा. धरतसभों िएक समा. 18 उसकयवसतथउसकहनत हविपविी; वह ें रखएगचय एगी. उनक्‍ि उनीं ें आएगहवमनरहकरेंे, ि उनकभरपजन और चमकवसिे.

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