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यशायाह 47

पतन

1 हवकहतैं, "ुंी,

आओ, ें ;

कसदिों िंसन पर नहीं,

अब ें ो.

ोंि अब ें

मल तथनहीं कहा.

2 चककर आटो;

अपनूंघट हटो.

वसउतो,

ि नदिां कर सको.

3 नगनतमन

लजहर िी.

ैं मसबदलूंा;

और एक यकि सका."

4 हमें टकसरवशकिहव

इसएल पविपरमवर ै.

5 "कसदिों ी,

धकें कर ां;

ोंि अब महलों

नहीं कहलओगी.

6 ैं अपनरजअपरसन्‍ा,

ैंअपनिअपवििा;

और ें ौंिा,

मनउन पर दयनहीं ी.

़ों पर

रख िा.

7 ि़िकरतरहि,

सदैं बनरहूंी!’

मनइन ों रख

और इसकें ा.

8 "इसलिे, अब ,

इस समय रकिरह रहो,

मन मन रहि,

िऐसनहीं ै.

ैं िधवसमूं

बच्‍िेंे.’

9 िंों ुःअचनक

एक िें पर पड़ेंे:

लकों तथिधवा.

अनों पर

तथशकि यह ा.

10 अपनगलतें रकअनभव करत

मनयहि, नहीं सकता.’

तथि ें भटकि

ोंि मनमन मन ा,

ैं ूं, िऐसनहीं ै.’

11 िंकषपर आएगी,

अपनू-इसकर िा.

पर िपति पड़े

िसकमनकरनिभव ा;

यह ऐसिपति ी, िसकिषय ें ें

यह पर अचनक पड़ेी.

12 "अपनू-ों, िसकमनबचपन अभिै,

कदिउससमकयद

यद उनकबल िरह सकी!

13 िकरते-करतथक गई ै, अब िी,

ों और नयांखकर नहबतैं, ें उससबचपर घटनै.

14 समआग ें जल ेंे,

अपनआपकआग बचेंे.

यह पनिनहीं,

और ेंकनिआग!

15 िनकहनत करतरहो—

बचपन िनस

नदरहै.

उनमें हर एक अपनपर भटक रहै;

रकिनहीं बचा.

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