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भजन-संहिता 4:2,4,6-8

2 हे मनखेमन! तुमन कब तक मोर महिमा के बेजत्ती करत रहिहू?

तुमन कब तक भरम ले मया करत रहिहू अऊ लबरा देवतामन के खोज म रहिहू?

4 कांपत रहव अऊ4:4 या गुस्सा होके पाप झन करव;

जब तुमन अपन दसना म रहिथव,

त अपन मन ला जांचव अऊ चुप रहव।

6 बहुंते जन पुछत हवंय, "कोन ह हमर उन्नति करही?"

हे यहोवा, तोर मुख के अंजोर हमर ऊपर चमका।

7 जब ओमन के अनाज अऊ नवां अंगूर के मंद बहुंत होथे,

त तेंह मोर मन ला आनंद ले भर दे।

8 सांति से मेंह लेटहूं अऊ सुतहूं,

काबरकि हे यहोवा, तेंहीच ह

मोला सुरकछा म रखथस।

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