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भजन-संहिता 55:4-6,12-14,22

4 मोर हिरदय ह भीतरे-भीतर पीरा म हवय;

मिरतू के आतंक मोर ऊपर छा गे हवय।

5 डर अऊ कंपकपी मोला घेर ले हवय;

बहुंत भय के कारन मेंह बियाकुल हो गे हंव।

6 मेंह कहेंव, "कास, मोर एक पंड़की सहीं डेना होतिस!

त मेंह उड़ जातेंव अऊ अराम करतेंव।

12 कहूं कोनो बईरी ह मोर बेजत्ती करतिस,

त मेंह सह लेतेंव;

कहूं कोनो बईरी ह मोर बिरूध खड़े होतिस,

त मेंह ओकर ले छिप जातेंव।

13 पर येह तो तें अस, मोर सहीं एक मनखे,

मोर संगवारी, मोर लंगोटिया संगी,

14 जेकर संग परमेसर के घर म

एक समय मेंह संगति के आनंद उठात रहेंव,

जब अराधना करइयामन के बीच

हमन आवत-जावत रहेंन।

22 अपन जिम्मेदारी यहोवा ऊपर डार दे

अऊ ओह तोला संभालही;

ओह धरमी ला कभू

डगमगावन नइं देवय।

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