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भजन-संहिता 55:4-6,17,22

4 मोर हिरदय ह भीतरे-भीतर पीरा म हवय;

मिरतू के आतंक मोर ऊपर छा गे हवय।

5 डर अऊ कंपकपी मोला घेर ले हवय;

बहुंत भय के कारन मेंह बियाकुल हो गे हंव।

6 मेंह कहेंव, "कास, मोर एक पंड़की सहीं डेना होतिस!

त मेंह उड़ जातेंव अऊ अराम करतेंव।

17 सांझ, बिहनियां अऊ मंझन के बेरा

मेंह ओला दुख म पुकारथंव,

अऊ ओह मोर बात ला सुनथे।

22 अपन जिम्मेदारी यहोवा ऊपर डार दे

अऊ ओह तोला संभालही;

ओह धरमी ला कभू

डगमगावन नइं देवय।

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