4 "हे यहोवा, ऐसा कर कि मेरा अन्त
मुझे मालूम हो जाए, और यह भी
कि मेरी आयु के दिन कितने हैं;
जिससे मैं जान लूँ कि कैसा अनित्य हूँ!
5 देख, तूने मेरी आयु बालिश्त भर की रखी है,
और मेरा जीवनकाल तेरी दृष्टि में कुछ है ही नहीं।
सचमुच सब मनुष्य कैसे ही स्थिर
क्यों न हों तो भी व्यर्थ ठहरे हैं। (सेला)
6 सचमुच मनुष्य छाया सा चलता फिरता है;
सचमुच वे व्यर्थ घबराते हैं;
वह धन का संचय तो करता है
परन्तु नहीं जानता कि उसे कौन लेगा!