क्षमाप्राप्ति का आनंद
1 क्या ही धन्य है वह जिसका अपराध क्षमा किया गया,
और जिसका पाप ढाँपा गया हो!
2 क्या ही धन्य है वह मनुष्य जिसके अधर्म का
लेखा यहोवा न ले,
और जिसकी आत्मा में कोई कपट न हो।
3 जब मैं चुप रहा तो दिन भर कराहते-कराहते
मेरी हड्डियाँ पिघल गईं।
4 मैं दिन और रात तेरे भारी हाथ के नीचे दबा रहा।
मेरा बल मानो ग्रीष्मकाल के ताप से क्षीण हो गया। सेला।
5 मैंने तेरे सामने अपना पाप स्वीकार किया
और अपना अधर्म न छिपाया।
मैंने कहा, "मैं अपने अपराध यहोवा के सामने मान लूँगा,"
और तूने मेरे पाप के दोष को क्षमा कर दिया। सेला।
6 इसलिए तेरा प्रत्येक भक्त ऐसे समय में
तुझसे प्रार्थना करे जब तू मिल सकता है;
निश्चय ही जल की बड़ी बाढ़ भी उस तक न पहुँचेगी।