1 क्या ही धन्य है वह
जो कंगाल की सुधि लेता है!
संकट के दिन यहोवा उसे छुड़ाएगा।
2 यहोवा उसकी रक्षा करके उसे जीवित रखेगा,
और वह पृथ्वी पर धन्य कहलाएगा।
तू उसे उसके शत्रुओं की इच्छा पर न छोड़ेगा।
3 रोग-शय्या पर यहोवा उसे संभाल लेगा;
उसके रोग के समय तू उसे बिछौने पर से उठाकर खड़ा करेगा।
4 मैंने कहा, "हे यहोवा,
मुझ पर अनुग्रह कर!
मुझे स्वस्थ कर, क्योंकि मैंने तेरे विरुद्ध पाप किया है।"
5 मेरे शत्रु यह कहकर मेरी बुराई करते हैं :
"वह कब मरेगा, और कब उसका नाम मिटेगा?"
6 जब उनमें से कोई मुझे देखने आता है,
तो वह झूठी बातें बोलता है;
वह अपने मन में दुष्टता की बातें रखता है,
और बाहर जाकर उन्हीं की चर्चा करता है।
7 मेरे सब बैरी मिलकर मेरे विरुद्ध कानाफूसी करते हैं;
वे तो मेरी हानि की योजना बनाते हैं।
8 वे कहते हैं,
"इसे तो कोई बुरा रोग लग गया है।
अब जो यह पड़ा है,
तो फिर कभी नहीं उठेगा।"
9 मेरा प्रिय मित्र,
जिस पर मैं भरोसा करता था
और जो मेरी रोटी खाता था,
उसने भी मेरे विरुद्ध लात उठाई है।
10 परंतु हे यहोवा, तू मुझ पर अनुग्रह कर
और मुझे उठा कि मैं उनसे बदला लूँ।
11 जब मेरा शत्रु मुझ पर विजयी होकर हर्षनाद नहीं कर पाता,
तो मैं जान जाता हूँ कि तू मुझसे प्रसन्न है।
12 मेरी खराई के कारण तूने मुझे संभाला हुआ है,
और तू अपने सम्मुख मुझे सर्वदा के लिए स्थिर करता है।
13 इस्राएल का परमेश्वर यहोवा आदि से अनंतकाल तक धन्य है!
आमीन, फिर आमीन।