5 हे मेरे मन, तू निराश क्यों है?
तू भीतर ही भीतर व्याकुल क्यों है?
परमेश्वर पर आशा लगाए रह;
मैं तो उसकी स्तुति करूँगा
जो मेरा उद्धारकर्ता
और मेरा परमेश्वर है।
5 हे मेरे मन, तू निराश क्यों है?
तू भीतर ही भीतर व्याकुल क्यों है?
परमेश्वर पर आशा लगाए रह;
मैं तो उसकी स्तुति करूँगा
जो मेरा उद्धारकर्ता
और मेरा परमेश्वर है।
5 मेरे प्राण, तुम ऐसे खिन्न क्यों हो?
क्यों मेरे हृदय में तुम ऐसे व्याकुल हो गए हो?
परमेश्वर पर भरोसा रखो,
क्योंकि यह सब होने पर मैं पुनः उनकी उपस्थिति
के आश्वासन के लिए उनका स्तवन करूंगा.
5 हे मेरे प्राण, तू क्यों गिरा जाता है?
और तू अन्दर ही अन्दर क्यों व्याकुल है?
परमेश्वर पर आशा लगाए रह;
क्योंकि मैं उसके दर्शन से उद्धार पाकर फिर उसका धन्यवाद करूँगा। (मत्ती 26:38, मर. 14:34, यूह. 12:27)
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