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Salmos 31

रकिथन
िशक िऊद भजन

1 यहा, ैं शरण ें आयूँ;

कभलज्‍िे।

अपनिकते!

2 अपनओर लगा;

े!

िशरण चट

और बचिगढ़ बन!

3 चटऔर गढ़ ै;

अपनििअगकर,

और गदरशन कर

4 उस ें ि

िउनोंििै,

ोंि गढ़ ै।

5 ैं अपनआतें ौंपतूँ;

यहा, सतपरम्‍वर,

कर ़ा िै।

6 ैं उनसकरतूँ

यरवसपर मन लगैं,

परभरयहपर ै।

7 ैं करमगन और आनिूँ,

ोंि ुःपर ्‍ि ै।

कष्‍ों ै;

8 और शतें पड़ननहीं िा,

बलि ों ें रखै।

9 यहा, पर अनरह कर,

ोंि ैं कट ें ूँ;

ें कमज़ोगई ैं—

और शरी।

10 वन

और आयकरहते-करहतघट चलै;

बल अधररण रहा,

और हडिाँ गईं।

11 अपनसब ििों रण

ैं िषकर अपनपड़िों ें िंिूँ।

ैं अपनपरििों ें भय रण बन गयूँ।

सड़क पर खतैं,

झसैं।

12 ैं तक समों मन िगयूँ;

ैं बरतन समगयूँ।

13 ैंबहों अपनिंै;

ों ओर भय भय ै।

उनोंिलकर िसममति

और षडरचा।

14 पर यहा,

ैं पर भररखतूँ;

ैं कहतूँ,

"परम्‍वर ै।"

15 आयें ै,

शतऔर सतों े।

16 अपनपर अपनरकचमका,

अपनकरबचे।

17 यहा, लज्‍ि

ोंि ैं रतूँ;

्‍लज्‍िों और अधें पचपड़रहें।

18 लनुँअहऔर अपम

धरििंें लतैं, ँ।

19 भलितनमहअपनभय

ननों िरख ै,

और अपनशरणगतों िमनों मनरकट ै।

20 उनें मनषडों बचकर

अपनउपसिि रकें िै;

उनें अपनशरणसें रखकर झगड़बचै।

21 यहधनै, ोंि उसनि

नगर ें पर अपनकरअदि रकट ै।

22 ैंघबरकर कहा,

"ैं ्‍ि गयूँ।"

िजब ैंी।

23 यहसब भक्‍ो, उससरखो।

यहसच्‍मनों रककरतै,

परअहा-बदलै।

24 यहपर आशरखनो,

हसबनऔर दय रहें।

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