4 हे यहोवा, ऐसा कर कि मैं अपना अंत जान लूँ,
और यह भी कि मेरी आयु के दिन कितने हैं।
मैं जानूँ कि मैं कैसा क्षणभंगुर हूँ।
5 देख, तूने मेरी आयु कितनी छोटी रखी है,
और मेरा जीवनकाल मानो तेरी दृष्टि में कुछ भी नहीं।
निश्चय हर एक मनुष्य,
कितना ही स्थिर क्यों न हो,
फिर भी भाप के समान ही है। सेला।
6 निश्चय हर मनुष्य छाया के समान चलता-फिरता है;
सचमुच लोग व्यर्थ ही घबराते हैं।
मनुष्य धन का संचय तो करता है
पर नहीं जानता कि उसे कौन लेगा।