30 धर्मी अपने मुँह से बुद्धि की,
और जीभ से न्याय की बातें कहता है।
31 उसके परमेश्वर की व्यवस्था
उसके मन में बसी रहती है,
उसके कदम फिसलते नहीं।
30 धर्मी अपने मुँह से बुद्धि की,
और जीभ से न्याय की बातें कहता है।
31 उसके परमेश्वर की व्यवस्था
उसके मन में बसी रहती है,
उसके कदम फिसलते नहीं।
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