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Salmos 65

परम्‍वर ि और रश
िशक िऊद भजनएक

1 परम्‍वर, िें ि रतकरतै;

और िमन्‍नतें ी।

2 थननने,

सब आएे।

3 अधरपर रबल ैं;

हमअपरों ाँै।

4 धनवह ि

नकर अपनिकट

ि गनों ें करे!

हम भवन े,

अरपवििउततम पदों ्‍ोंे।

5 हमउदरकरपरम्‍वर,

सब र-दों

और समर-विों आशै,

िकतअदों हमें उततर ै।

6 पररम कमरबकसकर

अपनमरपरवतों िकरतै;

7 समों हल, उनकलहरों गरजन,

तथि-ि लड़ ांकरतै;

8 इसलिर-दों रहन

ि्‍खकर डर गए ैं।

उदयचल और असचल ों जय जयककरै।

9 ि ि कर उसींचतै,

उसबहउपजबनै।

परम्‍वर नदजल भररहतै।

करकमनों िअन्‍उपजै।

10 इसकों भली-ाँि ींचतै,

और उसकिसमतल करतै।

ि वरों नरम करतै,

और उसकउपज पर आशिै।

11 वरअपनभलपहनै,

ों ें भरपै।

12 गल चरइयों ें हरिपड़तै;

और पहिाँ हरकटिाँैं।

13 चरड़-बकरिों भरैं,

और तरइयाँ अन्‍ैं,

जय जयककरतऔर ैं।

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