Pular para o conteúdo
Publicidade

स्तोत्र 1

1 कैसा धन्य है वह पुरुष

जो दुष्टों की सम्मति का आचरण नहीं करता,

न पापियों के मार्ग पर खड़ा रहता

और न ही उपहास करनेवालों की बैठक में बैठता है,

2 इसके विपरीत उसका उल्लास याहवेह की व्यवस्था का पालन करने में है,

उसी का मनन वह दिन-रात करता रहता है.

3 वह बहती जलधाराओं के तट पर लगाए गए उस वृक्ष के समान है,

जो उपयुक्त ऋतु में फल देता है

जिसकी पत्तियां कभी मुरझाती नहीं.

ऐसा पुरुष जो कुछ करता है उसमें सफल होता है.

4 किंतु दुष्ट ऐसे नहीं होते!

वे उस भूसे के समान होते हैं,

जिसे पवन उड़ा ले जाती है.

5 तब दुष्ट न्याय में टिक नहीं पाएंगे,

और न ही पापी धर्मियों के मण्डली में.

6 निश्चयतः याहवेह धर्मियों के आचरण को सुख समृद्धि से सम्पन्‍न करते हैं,

किंतु दुष्टों को उनका आचरण ही नष्ट कर डालेगा.

Estes versículos te tocaram? Ore agora!

+581 estão orando agora.

Junte-se à corrente de oração.