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स्तोत्र 138

रचना.

1 हव, ैं दय गहरआपकतवन करूंा;

ैं "वतं" मनआपकतवन करूंा.

2 आपकपवििओर कर ैं नतमसतक ूं,

आपककरा-ि; आपकसचिैं

आपकआभनतूं;

आपनअपनवचन अपनमहि

ऊपर िै.

3 िसमय ैंआपका, आपनरततर िा;

आपनों ें बल िा.

4 समसा, हव, आपकतजोंे,

ोंि उनोंआपकिकलवचन ैं,

5 हविों णगकरेंे,

ोंि हवबड़ा ै.

6 यदयपि हववयमहैं, वह नगणों रखतैं;

िंअहवह पहचैं.

7 यदयपि इस समय िषम समय चल रहै,

आप वन रकषक ैं.

आप अपनबढ़ाकर शतरकरककरतैं;

आपकां उदकरतै.

8 हविििउदकरेंे;

हव, सरवदआपककरा-.

अपनहसतकि परिि.

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