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स्तोत्र 100

एक . धनयवि

1 हवतवन ें समसउचवर ें जयघकरे.

2 हवआरधनआनदपवक ;

हरउनकउपसिि ें रवि.

3 यह समझ ि वयहवपरमवर ैं.

हमरचनउनीं ै, वयहमननहीं; हम पर उनीं िै.

हम उनकरजा, उनकचऱें ैं.

4 धनयवें उनकों ें

और तवन ें उनकगनों ें रवकरो;

उनकमहिधनकहो.

5 हवभलैं; उनककरसदै;

उनकसचरसरण समस़िों ें ै.

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