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स्तोत्र 110

रचना. एक .

1 हवरभे, कहा:

"ें पकें िजम.

शतैं

चरणों बनरहूं."

2 हव़िआपकमरयवजदिकरेंे,

"आपकसन आपकशतमधबसा!"

3 आपकआपकलड़ासमय

आपकी,

सबगरजनओस सम

पविरतिकर

आपकआएआपकजव.

4 यह हवशपथ ै,

अपनवकतवनहीं े:

"लख़ेृंखल

ें सनतन िो."

5 रभआपकें पकें ततपर ैं;

वह उदकर चल ेंे.

6 वह ों पर अपनिणय िकरेंे,

तकों लग एगऔर िों हतकर एगी.

7 तब महिझरनजल करेंे,

उनकिगरा.

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