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स्तोत्र 133

आरधनििों . रचना.

1 आदरऔर मनरम

वह िि जब इयों ें परसपर एकतै!

2 यह मनरम िि ै, जब रवििपर ै,

और बहत़ी तक पहुंै,

ां, अहऱी पर बहत,

उसकवसतक पहुंचतै.

3 हरमपरवत ओस सम,

़िपरवत पर पडै.

ोंि वहवह ,

जहां हवसरवदवन आशरदकरतैं.

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