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स्तोत्र 132

आरधनििों .

1 हव, और उनकगई

समसिषमतमरण ि.

2 उनोंहवशपथ ,

तथसरवशकिशपथ ी:

3 "ैं तब तक घर ें रवकरूं

और ैं अपनिपर ा,

4 ैं अपनों ें ींआनूं

और पलकों ें झपकी,

5 जब तक हविएक उपलब,

सरवशकिआवि."

6 इसकिषय ें हमनएफें ा,

अर ें यहगया:

7 "आओ, हम उनकआवचलें;

हम उनकचरणों ें कर आरधनकरें.

8 हव, अब उठकर अपनिथल पर इए,

आप और आपकमरी.

9 आपकिधरवसपहिों;

और आपकिहरं.’ "

10 अपनवक िि,

अपनअभििकरईए.

11 हवशपथ ी,

एक ऐसशपथ, िवह ़ेंनहीं:

"अपनशजों ें

एक ैं िंसन पर िजमकरूंा.

12 यदि शज लन करें

तथिगए उपदों लन करेंे,

तब उनकिंसन पर

सदा-सरवदििजमी."

13 ोंि ़िहविििगयै,

अपनआविहवयहअभिै.

14 "यह सदा-सरवदििि थल ै;

ैं यहीं िंसन पर िजमरहूंा, ोंि यहअभिै.

15 उसकिआशबड़ी जनी;

ैं इसकदरिों जन ्‍करूंा.

16 उसकिों ैं उदपरिों सजिकरूंा,

और उसकििसदहरषगरहेंे.

17 "यहां ैं बढा,

ैं अपनअभिििएक िकरूंा.

18 ैं उसकशतलजवसपहना,

िंउसकअपनिउजजवल रहा."

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