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स्तोत्र 128

आरधनििों .

1 सभधनैं, िनमें हवरति रदै,

उनकिों आचरण करतैं.

2 िसकिअपनों रम करतरहो, ें उसकरतिफल ्‍ा;

धनऔर कला.

3 परिें

पतफलदखलतसमी;

ों

ओर समी.

4 धनवह िसमें हव

रति रदै.

5 ़िहवमकवन

हर एक िआशों भरतरहें,

आजवन शलसमि ो.

6 वसः, अपनखनििरहो.

इसएल ें ांि िरहे.

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