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स्तोत्र 2

1 ों मचरहैं यह खलबली?

ों श-दैं िफल षड़्‍रचनें?

2 हवतथउनकअभिििें

एकि

एकजकर सक सममति कर रहैं:

3 "चलो, ेंें उनकगई ़िां,

उतें उनकांगई रसिां."

4 वह, वरििंसन पर िजमैं,

उन पर सतैं, रभउनकउपहकरतैं.

5 तब वह उनें अपनरकडरकर अपनें

उनें िकरतैं,

6 "अपनपविपरवत ़िपर वय

ैंअपनबसिै."

7 ैं हवषणकरूंा:

उनोंझसकहै, "ो;

आज ैं जनक गयूं.

8 झसांो,

ैं ें ूंतथ

िपति बनूंा.

9 उनें छडकड़े-कड़े कर े;

िों समर-चकर े."

10 तब , िबनो;

िों, सच.

11 रदें हवआरधनकरो;

थरथरआनमन.

12 सचें समो, ऐसि वह ि

और ें नष,

ोंि उसकभडकतै.

धनैं सभी, उनकआशरय ैं.

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