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स्तोत्र 58

िशक िे. "अलतशख़े" पर आधि. िकत58:0 शीर्षक: शायद साहित्यिक या संगीत संबंधित एक शब्द रचना.

1 ो, तव ें िणय गत ै?

ा, िणय तव ें िपकै?

2 नहीं, मन मन अनयपि करतरहतो,

पर िंपरसतो.

3 जनिसलतैं, गरी;

परमवर लतभटक ै.

4 उनकििसरिै,

उस बहरसरसम, िसनअपनकर रखैं.

5 ि अब उसे,

वह ितनमधरसकरे.

6 परमवर, उनकतर उनकांि;

हव, इन िंों ों उखि!

7 जल बहकर िं;

जब धनें, उनकितक नहीं पहुंें.

8 उस ोंसमं, सरकते-सरकतगल ै,

अथवउस जनिसम, िसकिरकअनभव असभव ै.

9 इसकि ़िों ें लगअगि पकतक पहुंे,

वह जलअथवअनजलों बवडर ें उड़ा ेंे.

10 धरिऐसपलटआननद-दयक ा,

वह ों रकें अपनांएगा.

11 तब मनयह कह उठेंे,

"िचय धरउततम रतिफल ्‍करतैं;

यह सति परमवर ैं और वह पर करतैं."

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