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स्तोत्र 111

1 हवतवन ो.

ैं दय हवतवन करूंा,

मनवों समिि और सभें.

2 अति उदैं हव;

उनकरसन्‍नतरण ैं, इनकमनन करतैं.

3 महिमय और भवैं हव,

उनकिकतसरवदै.

4 हवअपनइन ों अविमरणबनिै;

वह उदएवैं.

5 अपनरदिवह आहरबकरतैं;

वह अपनसदा-सरवदमरण रखतैं.

6 उनोंअपनरजपर इन ों मररकट कर ी,

जब उनोंउनें अनों ि रदी.

7 उनकिपन्‍समसिसयऔर ैं;

िसयैं उनकसभउपद.

8 सदा-सरवदिअटल ैं,

ि इनकलन सचएवें ि.

9 हवअपनरजउदिा;

उनोंअपनसदा-सरवदििकर ै.

उनकसबसअलग तथपविऔर भय-यै.

10 हवरति रदि ै;

उन सभें, इसनतैं, उततम समझ रहतै.

हवैं सरवददन.

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