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स्तोत्र 140

िशक िे. एक .

1 हव, ों उदरदि;

िंसक ों रकि,

2 मन मन अनरषड़्‍रचतरहतैं

और सदभडरहतैं.

3 उनोंअपनसरबनरखै;

उनकोंों िभरै.

4 हव, ों रकि;

उन िंसक ों रकरदि,

िोंे, ों उखिि ै.

5 उन अहिों ों िएक बनकर ििै;

तथरसिों एक ििै,

िउनोंिलगरखैं.

6 ैं हवकहतूं, "आप परमवर ैं."

हव, करकपर ि.

7 हव, रभु, आप उदबल ैं,

समय आप िआवरण बने.

8 ों अभिें, हव;

उनकि आगबढअनयथगरें े.

9 िोंइस समय ै;

उनकोंों उतपन्‍उनीं िपर पड़े.

10 उनकऊपर जलतयलों ि ो;

आग ें ेंिं,

दलदल गडें िं, ि उससहर िकल सकें.

11 िंदक इस ि पर अपनजमसकें;

िंसक अति पकड़े ं.

12 ैं नतूं ि हविपकअवशें

तथिे.

13 िचयतधरआपकआभेंे,

आपकउपसिि ें िकरेंे.

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