दावीद की रचना.
1 स्तुत्य हैं याहवेह, जो मेरी चट्टान हैं,
जो मेरी भुजाओं को युद्ध के लिए,
तथा मेरी उंगलियों को लड़ने के लिए प्रशिक्षित करते हैं.
2 वह मेरे प्रेमी परमेश्वर, मेरे किला हैं,
वह मेरे लिए दृढ़ गढ़ तथा आश्रय हैं, वह मेरे उद्धारक हैं,
वह ऐसी ढाल है जहां मैं आश्रय के लिए जा छिपता हूं,
वह प्रजा को मेरे अधीन बनाए रखते हैं.