दावीद की रचना.
1 याहवेह मेरी ज्योति और उद्धार हैं;
मुझे किसका भय हो सकता है?
याहवेह मेरे जीवन का दृढ़ गढ़ हैं,
तो मुझे किसका भय?
2 जब दुर्जन मुझे निगलने के लिए
मुझ पर आक्रमण करते हैं,
जब मेरे विरोधी तथा मेरे शत्रु मेरे विरुद्ध उठ खड़े होते हैं,
वे ठोकर खाकर गिर जाते हैं.
3 यदि एक सेना भी मुझे घेर ले,
तब भी मेरा हृदय भयभीत न होगा;
यदि मेरे विरुद्ध युद्ध भी छिड़ जाए,
तब भी मैं पूर्णतः निश्चिंत बना रहूंगा.