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स्तोत्र 30:1-12

1 याहवेह, मैं आपकी महिमा और प्रशंसा करूंगा,

क्योंकि आपने मुझे गहराई में से बचा लिया है

अब मेरे शत्रुओं को मुझ पर हंसने का संतोष प्राप्‍त न हो सकेगा.

2 याहवेह, मेरे परमेश्वर, मैंने सहायता के लिए आपको पुकारा,

आपने मुझे पुनःस्वस्थ कर दिया.

3 याहवेह, आपने मुझे अधोलोक से ऊपर खींच लिया;

आपने मुझे जीवनदान दिया, उनमें से बचा लिया, जो अधोलोक-कब्र में हैं.

4 याहवेह के भक्तो, उनके स्तवन गान गाओ;

उनकी महिमा में जय जयकार करो.

5 क्योंकि क्षण मात्र का होता है उनका कोप,

किंतु आजीवन स्थायी रहती है उनकी कृपादृष्टि;

यह संभव है रोना रात भर रहे,

किंतु सबेरा उल्लास से भरा होता है.

6 अपनी समृद्धि की स्थिति में मैं कह उठा,

"अब मुझ पर विषमता की स्थिति कभी न आएगी."

7 याहवेह, आपने ही मुझ पर कृपादृष्टि कर,

मुझे पर्वत समान स्थिर कर दिया;

किंतु जब आपने मुझसे अपना मुख छिपा लिया,

तब मैं निराश हो गया.

8 याहवेह, मैंने आपको पुकारा;

मेरे प्रभु, मैंने आपसे कृपा की प्रार्थना की:

9 "क्या लाभ होगा मेरी मृत्यु से,

मेरे अधोलोक में जाने से?

क्या मिट्टी आपकी स्तुति करेगी?

क्या वह आपकी सच्चाई की साक्ष्य देगी?

10 याहवेह, मेरी विनती सुनिए, मुझ पर कृपा कीजिए;

याहवेह, मेरी सहायता कीजिए."

11 आपने मेरे विलाप को उल्‍लास-नृत्य में बदल दिया;

आपने मेरे शोक-वस्त्र टाट उतारकर मुझे हर्ष का आवरण दे दिया,

12 कि मेरा हृदय सदा आपका गुणगान करता रहे और कभी चुप न रहे.

याहवेह, मेरे परमेश्वर, मैं सदा-सर्वदा आपके प्रति आभार व्यक्त करता रहूंगा.

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