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Salmos 84

िशक िे. ि पर आधि. ों रचना. एक .

1 सरवशकिहव,

मनरम आपकि!

2 हवगनों उतकट अभिकरत

ितक ैं;

दय तथ

वनपरमवर तवन करनलगतै.

3 सरवशकिहव, ा, परमवर,

आपकिकट ों आव,

तथअबअपनबचों रखनि,

सलि, ्‍गयै.

4 धनैं े, आपकआवें िकरतैं;

ितर आपकतवन करतरहतैं.

5 धनैं े, िनकशकि आप ैं,

िनकदय ें ़िजमैं.

6 जब ें कर आगबढैं, उसमें झरनपडैं;

शरदकवरजलशय भर ैं.

शरदकि उस आशों भरपकर ै.

7 तब तक उनकबल उततरतर ि ै,

जब तक ि़िपहुंचकर उनमें हर एक परमवर मनउपसिें.

8 हव, सरवशकिपरमवर, थनि;

परमवर, ि.

9 परमवर, हमपर ि ि;

अपनअभििपर ि ि.

10 आपकपरिसर ें एक ि,

अनयतहजिों उततमतर ै;

ों डप ें िअपैं,

आपकभवन रपउपयसमझतूं.

11 िहवपरमवर एवैं;

महिएवसमहवअनरह ैं;

िकलवह ि

उततम वसकर नहीं रखते.

12 सरवशकिहव, धनवह,

िसनआप पर भररखै.

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