शरण मांगणा लै अरज़
गाज़ै-बाज़ै आल़ेए सैणैं लै राज़ै दाबेदो भज़न
1 हे बिधाता, हुंह लआ ताह सेटा शरण,
मुंह निं लोल़ी शर्मिंदै पल़अ हणअ।
तूह आसा धर्मीं परमेशर,
हुंह करा ताखा एही अरज़ कि मुंह बच़ाऊ।
2 हे बिधाता, मेरी अरज़ शुण! मुंह बच़ाऊ छ़ेक्कै,
तूह बण मुल्है मेरी शरण लणें बडी टोल्ह अर
इहअ गहल़ ज़िधी हुंह बच़ी सका।
3 हे बिधाता, मेरी शरण लणें बडी टोल्ह अर बच़णा लै गहल़ आसा तूह ई।
तूह खोज़ मुखा आजूए बात अर तूह नढैऊ मुंह तिहअ ई ज़िहअ तंऐं बोलअ द आसा।
4 ज़ुंण गुप्त ज़ज़ाल़ मुल्है मेरै दुशमणै आसा छ़ैई डाहै दै,
तिन्नां आफ़ता का डाहै तूह मुंह बच़ाऊई।
5 मंऐं छ़ाडी आपणीं ज़िन्दगी तेरै आसरै।
हे परमेशर बिधाता, हुंह डाहा तेरअ ई भरोस्सअ
किल्हैकि हुंह आसा तंऐं बच़ाऊअ द।