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ज़बूर 122

1 ैं ़ुजब वह कहनलग

"आओ ़ुवनघर चलें।"

2 शल! हमदम,

टकों अनदर ैं।

3 शलऐसशहर तरह नजबनो।

4 जहाँ ा’़ुवने,

इसईल शहदत ि, ़ुवनकरनें ैं।

5 ूँि वहाँ 'अदलत तख़्,

ा’ऊद ़ातख़़्ाईम ैं।

6 शलसलमतकरो,

वह हबबत रखतैं इकबलमोंे।

7 अनदर सलमती,

और महलों ें इकबलमो।

8 ैं अपनइयों और ों ़ाि,

अब कहूँें सलमतरहे!

9 ़ुवनअपऩुघर ़ाि,

ैं भलिरहूँा।

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