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ज़बूर 127

1 अगर ़ुवनघर बन,

बनों हनत' ै।

अगर ़ुवनशहर ि़ाकरे,

िगहबगन'ै।

2 िसवउठनऔर ें आरकरना,

और मशक़्'ै;

ूँि वह अपनमहबींें ै।

3 ो, औल़ुवनतरफै,

और फल उसतरफअजै,

4 जवऐसैं,

बरदसें

5 ़ुनसवह आदमिसकतरकश उनसभरै।

जब वह अपनमनों टक पर ें करेंशरिोंे।

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