1 मुबारक है वह जिसकी ख़ता बख़्शी गई,
और जिसका गुनाह ढाँका गया।
2 मुबारक है वह आदमी जिसकी बदकारी को ख़ुदावन्द हिसाब में नहीं लाता,
और जिसके दिल में दिखावा नहीं।
3 जब मैं ख़ामोश रहा
तो दिन भर के कराहने से मेरी हड्डियाँ घुल गई।
4 क्यूँकि तेरा हाथ रात दिन मुझ पर भारी था;
मेरी तरावट गर्मियों की खु़श्की से बदल गई। सिलाह
5 मैंने तेरे सामने अपने गुनाह को मान लिया और अपनी बदकारी को न छिपाया,
मैंने कहा, मैं ख़ुदावन्द के सामने अपनी ख़ताओं का इक़रार करूँगा
और तूने मेरे गुनाह की बुराई को मु’आफ़ किया। सिलाह
6 इसीलिए हर दीनदार तुझ से ऐसे वक़्त में दुआ करे जब तू मिल सकता है।
यक़ीनन जब सैलाब आए तो उस तक नहीं पहुँचेगा।