11 ऐ मेरी जान! तू क्यूँ गिरी जाती है?
तू अंदर ही अंदर क्यूँ बेचैन है?
ख़ुदा से उम्मीद रख, क्यूँकि वह मेरे चेहरे की रौनक और मेरा ख़ुदा है;
मैं फिर उसकी सिताइश करूँगा।
11 ऐ मेरी जान! तू क्यूँ गिरी जाती है?
तू अंदर ही अंदर क्यूँ बेचैन है?
ख़ुदा से उम्मीद रख, क्यूँकि वह मेरे चेहरे की रौनक और मेरा ख़ुदा है;
मैं फिर उसकी सिताइश करूँगा।